प्रथम खण्डः
॥ भारद्वाजो बार्हस्पत्यः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
अग्ना॑आ᳒याहीवी᳒ता᳒ये । गृ᳒णा᳒नोहव्यादा॑तये । नीहो᳒ता॑सत्सीबर्हीषि॑ ॥ १ ॥
ओतग्नातइश। आ याथाच्ही वाचाइश। ता याटाइता याटिइश। गृ णाचानोशहव्या दाचि। ता याटाइता याटिइश। नाइ होकिताच। साटत्साटइ बाखाऔहो वाशि। हीखषिश ॥ १ ॥
अग्नआयाही वीतू। तायाइगृणा नोषूहव्यदा ताटीयातइश। नीहो ताचिसत्सीब र्हाटीइ षीता। ब र्हाटाइ षाखाऔहो वाशि। बचर्ही षीखा ॥ २ ॥
अग्नआयाही वातूइता यातिइश। गृणानोहव्य दायूतापयेश। निहो ताखिसाणत् । साटइ बाताॠ हापाआइ षोप्लि। हा इशा ॥ ३ ॥
॥ भारद्वाजो बार्हस्पत्यः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
त्वा॑माग्नेयज्ञा᳒नां । हो॑ताविश्वे॑षांहितः । देवेभि॑र्मानूषे॑जने ॥ २ ॥
त्वमग्नेयज्ञा नांषूत्वम ग्नातिइश। यज्ञानांहोता वि श्वेषृषां हाटाइ ताःता। देकवाइ भाटिइ र्माता। नु षेताच्जकना औटाहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥ ४ ॥
॥ मेधातिथिः काण्वः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
अग्निंदूतं᳒वृ॑णीमहे । हो᳒ता॑रंविश्वा᳒वे॑दसं । अस्या᳹यज्ञास्या॑सुक्रा॑तुम् ॥ ३ ॥
अग्नि न्दूटितातम् । वृणीमहा इषूहोता रांटिवीतश्वा वेचाद साचाम् । अस्य याटिज्ञातओ औकाहोतवात। स्या सूचाकृतूमि ळाटीभाखण। ओपइ ळाप्ला ॥ ५ ॥
॥ भारद्वाजो बार्हस्पत्यः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
अग्निर्वृ॑णि॑जङ्घनात् । द्रविणास्यु᳹र्वीपन्या᳒या । सामी᳒द्धश्शुक्रा᳒आहूतः ॥ ४ ॥
अग्निर्वृ त्राती। णाटइ जाखाऔहो वाशि। घाखनाशात् । द्रचविशणाकस्युर्वी पकिन्या याटाओइसमि द्धाटुश्शूत। क्रा याचाहुताइ ळाटीभाखण्। ओपइ ळाप्ला ॥ ६ ॥
अ ग्नीखारौहो वाशिहाइवृत्रा णीशु। ज ङ्घाटानातदौ होटावातइश। द्रवि णापिस्यूःण। ओइवा इषीपन्या याटि। सामाइ द्धाटीट्श्शूखऔहो वाशि। क्राया हूटिताःख ॥ ७ ॥
ओतग्नीःत। वृत्रा णीकिजङ्घना दौकीहोऔ होखिवाश। द्र वीचाणाकस्युर्वी पकिन्य याचाऔकहोऔ होखिवाश। समि द्धाचिश्शुक्र याचिऔकहोऔ होखिबाप्लहू तोप्ला। हा इश ॥ ८ ॥
॥ उशनाः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
प्रेष्ठं᳸वोआतीथिं । स्तू᳒षे᳒मित्रामीवाप्रीयं । अ᳒ग्नेराथन्ना᳒वेद्यम् ॥ ५ ॥
प्रेष्ठं वाःति। अ ताटाइ थीताम् । स्तु षेचामित्रमिव प्राटुयातम् । अग्नाइ राभीथातन्ना वाटाहाखणइश। दापआ याप्लाम् । हा इशा ॥ ९ ॥
प्रेष्ठंव योतीहातइश। अ ताटाइ थीताम् । स्तू षाताइशमी त्रातामी वाटाप्राखयाणम् । औथहोचइश। अ ग्नेथारा थाटान्नापवेश। दाखयाशम् । हा इशा ॥ १० ॥
प्रेष्ठं वोतिहातबुश। आतिथाइं स्तूषुषेमि त्रामीव प्राटूयातम् । अग्नाइ राटीट्थाखऔहो वाशि। नावे दीटियाखम् ॥ ११ ॥
॥ सुदीतिपुरुमीढा-वांगिरसौ तयोर्वाऽन्यतरः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
त्वन्नोआग्नेमा᳒हो॑भिः । पाहीविश्वा॑स्याआ᳒रा॑तेः । ऊत᳒द्वीषोमर्क्त्या॑स्या ॥ ६ ॥
त्वन्नो याति। ग्नेचमा होथाभिःपाहाइ वीटुश्वात। स्याचआरा तेथिच्रू ताचाद्वायइ षाःटा। माकर्त्याथस्याइ ळाटिभाखण्। ओपइ ळाशा ॥ १२ ॥
त्वांत्व न्नोषिअग्नेम होतीभातइःश। पाकहिविश्वा औटीहोतस्या औटाहोतआरा तेकिच्रू ताचाद्वायइ षाःटा। म र्तोटाट्याखऔहो वाशि। स्याख ॥ १३ ॥
॥ भारद्वाजो बार्हस्पत्यः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
एह्यू᳒षुब्रा᳒वा॑णिते । अग्नाइत्थे᳹ता॑रा॑गीराः । ए᳒भिर्वार्धा॑साइ᳒न्दू॑भिः ॥ ७ ॥
ए ह्यूफाषुब्रा वाखिणाइता इशी। अग्नइ त्थेषीतरा गाटिइ राःचा। ए भाटाइर्वा धाचि। स याटाहाखण्इश। दोपभोप्ल। हा इशा ॥ १४ ॥
एह्यू षूषिब्रवौहो णातीइ ताताइश। अग्नइत्थेत रायूगीपराःश। एभि र्वाखिर्द्धाण। स याटाहाखण्इश। दोपभोप्ल। हा इशा ॥ १५ ॥
॥ वत्सः काण्वः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
आ᳸तेवात्सो᳒मानोयमात् । परामा᳹ञ्चित्साधास्थात् । अ᳒ग्ने᳒त्वांकामयोगी᳒रा॑ ॥ ८ ॥
आतेव त्साःती। माचनोशयमत्पा राचीमाथच्चित्सा धाटिस्थातत् । अग्नाइ त्वाभीङ्कात। म योपाबाप्लगाइ रोप्लि। हा इशा ॥ १६ ॥
आतेव त्सोषीमनोयमद य्यातूहातइश। पारा माषिच्चित्सधस्थाद य्याटूहोकच्इ याशा। अग्नेत्वा ङ्काषीमायाअ य्याटूच्होकचइ याशा। गी राकाइ ळाटाभाखण्। ओपइ ळाशा ॥ १७ ॥
॥ भारद्वाजो बार्हस्पत्यः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
त्वामाग्नेपु᳹ष्काराद᳒धी॑ । आ᳸थ॑र्वाणीरा॑मन्धत । मूर्ध्नो᳒विश्वास्यावाघा᳒ता॑: ॥ ९ ॥
त्वामग्नेपु ष्कातुराद धीति। आचथ र्वाचानाइरा माटीन्धाखताण। मूखर्ध्नोप्लवाखइ श्वाणा। स्या वोपाबाप्लघा तोप्ला। हा इशा ॥ १८ ॥
॥ वामदेवः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
अग्नेवी᳸वा᳒स्वादा᳒भारा । अस्मभ्यामू᳒ता᳹ये॑माहे᳒ । देवोह्यासी॑नोदृशे ॥ १० ॥
अग्नेवि वषीस्वदाभरो वातूहातइश। अ स्माचाभ्या मूकाच्ता याचाइम हाटिओ वाटाहातओ वाटाहातइश। दाचइ वोयाहि याटाओ वाटाहातओ वाटाहातइश। साटइ नाखाऔहो वाशि। दृ शेताच् ॥ १९ ॥
द्वितीय खण्डः
॥ आयुन्ङ्क्श्वाहि: (ऋ विरूपांगिरसः) ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
नामास्ते᳒अग्ना᳒ओज॑से । गृणन्तीदे᳒वा॑कृष्टायाः । आमै᳒रामित्रा᳒मर्दया ॥ १ ॥
नमस्तौ होतिग्नातइश। ओजा साकिइगृ णाटिन्ताखइ देणा। वाचकायरिष्टा याःटि। आमाइ राटीट्माखऔहो वाशि। त्रमर्द याखी ॥ १ ॥
॥ वामदेवो गौतमः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
दूतंवो॑विश्वावे॑दसम् । हव्यावाहामामा᳒र्क्त्यम्॑ । याजीष्ठमृन्जसे᳒गीरा ॥ २ ॥
दूणतांफवोखविश्ववेद साशुम् । हाथव्यावाहाम माटुर्त्ताखयणम् । याचजिष्ठमृञ्ज सेटुहातइश। गीचरा औटाहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥ २ ॥
॥ प्रयोगो भागर्वः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
ऊपात्वाजामायो᳒गीराः॑ । देदीशतिर्हा॑विष्कृताः । वायोरा॑नीकेअस्थिरन् ॥ ३ ॥
उपत्वा जाती। म योटागी राःटा। ओइयायू र्दाषुइदिशती र्हातूविष्कृ ताःटि। ओकइया यूटिच्र्वाकयो राटानीत। कया स्थाखिइ रात्रान् । अ श्वाथागाटवाःख ॥ ३ ॥
उपत्वाजा मातुयोगी राःति। दाचइशदि शाकाताइर्हा विटीष्काखर्ताःण। वायोर नातीहाइका याती। स्थाइ राटिऔ होखावाइ ळाशि ॥ ४ ॥
॥ मधछु न्दा वैश्वामित्रः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
ऊ॑पात्वाग्नेदीवे᳒दीवे । दो᳒षा॑वस्तार्धीयावायम्᳒ । ना᳒मोभा᳹र॑न्ताएमा॑सि ॥ ४ ॥
ऊपा त्वापिग्नेदिवेदिवा इशू। दो षाटावा स्ताटार्द्धी याचावा यचाम् । ना मोटाभा राटाच्न्ताचएकमाटसाखण्इश। ओपइ ळाशा ॥ ५ ॥
॥ शुनः शेप आजीर्गितः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
जरा॑बोधाताव्दीविड्ढी । वीशेवी᳒शेय॑ज्ञीयाया । स्तो᳸मंरुद्रायादृशीक᳒म् ॥ ५ ॥
जा राता। बो धाटाबो धाटाता द्वीचावि ढ्ढाचाइश। वी शेकावाइ शेटिय ज्ञोटाया याखाऔहो वाशि। स्तो मंकारूद्रायदृ शीकूकाचम् ॥ ६ ॥
जराबो धोतीवात। ताचद्वीवि ड्ढाचिइश। वीशाइ वाटीइ शेता। याथज्ञीशयाया स्तोकिच्मांचरूयद्रापयाणदृश। शी कोखाइ ळाशा ॥ ७ ॥
॥ मेधातिथिः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
प्रातित्यञ्चा᳒रुमाध्वारं᳒ । गो᳸पी॑था᳒यप्रा᳒हू॑यसे । मा᳒रुद्भीरग्नाआग॑हि ॥ ६ ॥
प्राति त्यापिञ्चारूमध्व राशुम् । गो पीथाथाया प्राचिहुकयाखसाणइश। मा रूचात्भीकराग्ना याटिगचहा औटाहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥ ८ ॥
॥ शुनः शेप आजीर्गितः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
अ॑श्वन्न᳒त्वावारा॑व᳒न्तम् । व᳸न्द᳹ध्याआग्नि᳒न्नामोभिः । स᳒म्म्रा᳒जन्तमाध्वाराणा॑म् ॥ ७ ॥
आ श्वाटाऔ होखावाश। ना त्वाटाऔ होखावाश। वारव न्तंषीवन्द ध्यैति। आ ग्नाटाऔ होखावाश। नमो भिषिस्सम्म्राज न्तातुम् । आध्व राकिणा मौपाहो बाप्ला। होप्लइ ळाशा ॥ ९ ॥
अश्वन्न त्वाषीवारव न्तातीम् । वन्द ध्याषिअग्निन्नमो भाचुइःश। सकम्म्रा जथाच्न्ता माचाध्व राखाऔहोवा इखुहो हाणइश। औकहोटयाखऔहो वाशि। णाखम् ॥ १० ॥
अश्वन्नत्वाबु होतूहातइश। वारा वाखिन्तंशव न्दकाध्योपहाणइश। अग्नाइन्न मापुऔहोवाइ होखुहाणइश। उहु वाखिभीःण। सकम्म्रा जथान्तामाध्व रापीऔ होवाइ होखुहाणइश। उहु वापिणामेहि याप्लीहाश। होप्लइ ळाशा ॥ ११ ॥
॥ प्रयोगो भागर्वः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
और्वा᳒भृगूवच्छूचिम् । आप्नावा᳒नावादाहु॑वे । अग्निं᳹सामुद्रावाससम् ॥ ८ ॥
और्वभृगुव दोचूहातइश। शोखचिशम् । आप्ना वाटिनाकवा दाटाहु वाटाइहुवा योचीइश। अ ग्नाटाइंसा मूटिच्सामू ओचि। द्रा वाचासाकसातबुश। बाख ॥ १२ ॥
और्वभृगु वषुच्छुचि मेतिशु चिताम् । आप्न वाकिनाचवा दाटाहु वाताइहु वाटिइहु वाटिएत। अग्नाइं साटीमूतसा मूटासा मूटाएत। द्राट्ट्वाखऔहो वाशि। साचसाटमेख ॥ १३ ॥
॥ प्रयोगो भागर्वः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
अ᳒ग्नी᳒मिन्धानो॑माना॑सा । धी॑यंसचेतामा᳒र्त्याः॑ । अ᳒ग्नी᳒मिन्धेवीवा᳒स्वा॑भिः ॥ ९ ॥
अग्नि मिषिन्धानोमनसौहोऔहो वातेहातइश। धीयंसचेत मौटूहोटहातहो वाटार्त्याःता। अग्नाइ माटीट्इ न्धाखाऔहो वाशि। वीवा स्वाटिभीःख ॥ १४ ॥
॥ वत्सः काण्वः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
आदी᳒त्प्रत्ना᳒स्यारे᳒ता॑सः । ज्योतिःपश्यन्तीवासा᳒रम् । पा᳒रोयातिध्या᳹तेदीवि᳒ ॥ १० ॥
आदिप्र त्नाफीस्य रेशात साःका। ज्योतिःप श्यषीन्तिवा साटिराचम् । पारो याटितिध्य ताचिइश। दिविहोइ हो औकूहो औकाहो वापाहाप्लबुश। बाख ॥ १५ ॥
तृतीय खण्डः
॥ प्रयोगो भागर्वः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
अग्निंवोवृधन्तं । अध्वाराणांपुरूतामं । अच्छानाप्नेसाहा᳒स्वते ॥ १ ॥
अग्निंवोवृ धातुन्तातम् । आ ध्वाचारा णांथाच्पू रूकातायमौटहो वाटाहातइश। आ च्छाटाना प्त्रेटा। साकहोपबाप्लस्वा तोप्ला। हा इशा ॥ १ ॥
अग्निं वातिएत। वृध न्ताषिमध्वराणांपु रूकूतमम च्छाटीच्होयइ नाटाप्त्रेत। साहा स्वापितात्रइश। ईखतिश ॥ २ ॥
अग्निं वोतिहातइश। वृ धाटान्तातम् । आध्वराणां पु रूयूतापमाशम् । अच्छान प्त्रोखीहाणइश। साकहोपहाचइश। स्वाकता औटाहोखबाप्ल। होप्लइ ळाशा ॥ ३ ॥
॥ भाद्वाजो बार्हस्पत्यः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
अग्निस्तिग्मे᳹ना॑शोचीषा॑ । यंसद्वि᳒श्वंन्याटट्यत्रीणं । अ᳒ग्नि᳒र्नो॑वंसतेरायिम्᳸ ॥ २ ॥
आ ग्नाटाउ वोखावाश। ति ग्मेथाच्नाकशोचाइ षाटीउ वोखावाश। यं साटाउ वोखावाश। वाइश्वान्या त्राइ णाटूउ वोखावाश। अग्नि र्नोटिवंस तेकिच्रा यीचाम् ॥ ४ ॥
ओहाया ग्नीःती। ताखइ ग्मेशानाशो चाखिइ षाणा। यं साटाद्वाखइ श्वाशानीया त्राखिइ णणाम् । अग्नि र्नोटिवं साटाट्ताखऔहो वाशि। राखयिशम् ॥ ५ ॥
अग्निस्ति ग्मेषीनशोचिषाइ हातू। यंसद्वि श्वषीन्न्य त्री णाटिमि हाता। अग्निर्नोवंस ताटूइ हाता। रापआया इंप्लि। हा इशा ॥ ६ ॥
॥ वामदेवो गौतमः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
अग्नेमृ᳹ळामाहंआ॑सि॑ । आ᳒याआ᳹दे॑वायुन्ज॑नम् । ईये᳸थाबर्ही॑रासादम् ॥ ३ ॥
अग्नाइमृ ळाटुमहं याखिसीण। आयआ दाटीइवयु न्जाखीनणम् । ईयेथा बाटीर्हिरा साखि। दात्रम् ॥ ७ ॥
आणग्नेफमृळा माफिहंया सिफिओ हाखाओखहाश। आणयाफआदे वाफियुन्ज नाफिमोखहा ओखाहाश। इयाई थाटीबर्हिरा साखा। दात्रम् ॥ ८ ॥
॥ वसिष्ठो मैत्रावरुणिः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
अ᳒ग्नेर᳹क्षाणोअं᳒हा॑सः । प्रा᳒तीस्मदेवरिषाताः । ता᳒पीष्ठैराज᳒रोदहा ॥ ४ ॥
अग्नेरा क्षाखीणोशअंहा सःप्लि। प्रातिस्म देकीवारी षाटिताःत। तापाइ ष्ठाटीइ राता। जरो दाटिहाखण्। ओपइ ळाशा ॥ ९ ॥
अग्नेयू ङ्क्ष्वाखीहीशयेता वाप्लि। अश्वासो देचीवासा धाटिवाःत। आरं वाटिहातन्तीकया शाटावाःखण्। ओपइ ळाशा ॥ १० ॥
॥ वसिष्ठो मैत्रावरुणिः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
नित्वा॑नक्ष्यविस्पते । धू᳒म॑न्त᳒न्धीमहेवायम् । सु᳒वी᳒रामग्नआ᳸हुतः ॥ ६ ॥
नित्वा होखिइन क्ष्याशि। वाचइस्पा ताचिइशद्यूकम न्तथान्धाइ माचिहेकवाखयणम् । सु वोताहातइश। राम ग्नाचिओपबाहू तोप्लि। हा इशा ॥ ११ ॥
॥ विरूप आंगिरसः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
अ᳒ग्नि᳒र्मूर्द्धादीवाःकाकू᳒त् । पा᳒तीःपृथिव्या᳒आ᳒यम् । आपांरेतांसिजिन्वति ॥ ७ ॥
अग्निर्मूर्धा दीतुवःक कूतित् । पा तीःटापा र्त्थीटाव्याअ याचिम् । आ पांटाराइ तांटिसीकजि न्वाटाताखण्इश। ओपइ ळाप्ला ॥ १२ ॥
॥ शुनः शेप आजीर्गितः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
ई᳒मामू॑षुत्वाम᳒स्मा॑कम् । सा᳒नि᳹ङ्गा॑यात्र᳒न्नव्या॑सम् । अग्ने॑दे᳒वे᳒षुप्रा᳒वोचः ॥ ८ ॥
इममू षूती। त्वामा स्माटिकातम् । सा निंटाहोइ गा याटीहोकतृथन्न व्यांटासाताम् । आ ग्नेटाहोइ दे वाटीहोकथ्षुप्रा वोटिचाःखण्। ओपइ ळाप्ला ॥ १३ ॥
॥ गोपवन अत्रयेः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
तन्त्वा॑गोपा᳒वा॑नोगिरा । जा᳒नि॑ष्ठदग्नेअङ्गिरः । सा᳒पा॑वकाश्रू॑धीहा᳒व॑म् ॥ ९ ॥
तन्त्वागो पाती। वा नोटागाखइ राःणा। ज नाचाइष्ठादग्ना याटूङ्गाखइ राःणा। सपौवाउ वोखुवाशकौवाउ वोखिवाण। श्रुधीह वांप्ली। होपइ ळाशा ॥ १४ ॥
॥ वामदेवो गौतमः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
पा᳒रिवा᳒जपतीःकाविः᳒ । अ᳒ग्नि᳒ऋ᳒हव्या᳒न्या॑क्रमीत् । दध᳒द्रत्ना᳒नीदाशू᳒षे᳒ ॥ १० ॥
परियौ होषीइवा जाति। पा ताचाइः कायावीःट। अ ग्नीचार्ह व्याथान्नाटयःक्र मीटित् । दधा द्राटिट्त्ना औहो वाशि। नि दाताशू षेटाख् ॥ १५ ॥
उदुत्य मोतीहातइश। जाता वेकिदाखसणम् । देकवंवहन्ती केकुताखवाःण। दा र्शेपाहाणइश। वाइ श्वाकिच्याकसूर्या मौपिहो बाप्ला। होप्लइ ळाशा ॥ १६ ॥
॥ मेधातिथिः काण्वः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
का᳒वी᳒माग्नी᳒मू᳒पा॑स्तुहि । स᳒त्या᳒धर्मा॑णमाध्वारे । दे᳒वा᳒मा॑मीवाचा᳒ता॑नम् ॥ १२ ॥
कविम ग्नीतीम् । उपा स्तूटिट्हाखऔहो वाशि। स त्याचाधकर्माण माचिध्वा रेचा। देवाम मीती। वाचा ताटिनाखण्म् । ओपइ ळाप्ला ॥ १७ ॥
॥ सिन्धुद्वीप आम्बरीषः त्रित आत्यो वा ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
श᳸न्नो॑देवी᳒राभीष्टा॑ये । श᳒न्नो॑भूवन्तूपीता᳒ये॑ । श᳒य्योराभि᳒स्रावन्तूनः ॥ १३ ॥
शन्नोदे वीःती। आभी ष्टाटियाखइशन्नोभु वाशुम् । तूपी ताटियाखइशय्योर भीःशु। श्रावा न्तूटिट्नाखऔहो वाशि। ऊखपाश ॥ १८ ॥
हु वाताहोपइशन्नोदे वीप्लुरभिष्ट याङिइश। हु वाताहोपइशन्नोभु वाप्लुन्तूपीता याङीइश। हु वाताहोपइशय्योर भीप्लुस्रव न्तुङिनाःश। हु वाताहोटयाखऔहो वाशि। ऊखपाश ॥ १९ ॥
॥ उशना काव्यः ॥ अग्निः ॥ गायत्री ॥
कस्यानू᳒नम्पारी॑णसि । धीयो॑जिन्वसिसत्पते । गो᳒षा᳒तायस्यातागी᳒राः᳒ ॥ १४ ॥
कस्यानू नाटीम्पारी णाखिसीण। धीयोजि न्वाटीसीसा त्पाखिताणइश। गोचषा ताचाया स्याटाट्ताखऔहो वाशि। उ प्गीखाराःश ॥ २० ॥
ओकहो वाथाइहु वाटिइहु वाचिएत। कस्यनू नाखीम्पा रीचाणा सीफा। ओकहो वाथाइहु वाटिइहु वाचिएत। धीयोजि न्वाखीसी साचात्पा तीफाम् । ओकहो वाथाइहु वाटिइहु वाचिएत। गोषषाता यस्यता गाखूइश। राःत्र ॥ २१ ॥